जंतर-मंतर का सुलगता संग्राम: तानाशाही सोच के खिलाफ अब उठानी होगी हुंकार
देश की राजधानी दिल्ली का जंतर-मंतर इस समय देश के युवाओं, छात्रों और जागरूक नागरिकों के आक्रोश का केंद्र बना हुआ है। पिछले कुछ दिनों से जंतर-मंतर पर चल रहे विरोध प्रदर्शन (परीक्षाओं में धांधली और पेपर लीक मामलों को लेकर) ने अब एक विकराल रूप ले लिया है। इस पूरे घटनाक्रम ने देश की मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था और खासकर केंद्र सरकार के रवैये पर बहुत बड़े और गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जंतर-मंतर के हालिया अपडेट: क्या हो रहा है जमीन पर?
- छात्रों और युवाओं का जनसैलाब: शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही और पारदर्शिता की मांग को लेकर देश भर के छात्र और युवा जंतर-मंतर पर डटे हुए हैं। सोनम वांगचुक जैसे पर्यावरणविद् और अन्य प्रमुख चेहरों का समर्थन इस आंदोलन को और मजबूती दे रहा है।
- दमन और तानाशाही का माहौल: शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे युवाओं की आवाज़ सुनने के बजाय, प्रशासन और सरकार द्वारा बल प्रयोग, भारी पुलिस छावनी, आंसू गैस के गोले और इंटरनेट सेवाओं पर पाबंदियां लगाने की खबरें लगातार सामने आ रही हैं।
- संसद से सड़क तक गूंज: यह मामला अब केवल एक कोने का विरोध नहीं, बल्कि संसद के दोनों सदनों से लेकर सड़कों तक मुख्य चर्चा का विषय बन चुका है, जहां सरकार विपक्ष के सवालों से बचती नजर आ रही है।
तानाशाही का बढ़ता दायरा: लोकतंत्र पर सीधा प्रहार
जब देश का युवा अपने भविष्य, रोजगार और पारदर्शी शिक्षा प्रणाली के लिए सड़कों पर उतरता है, और बदले में उसे लाठियां, आंसू गैस और दमन मिलता है, तो इसे लोकतंत्र नहीं बल्कि घोषित तानाशाही कहा जाएगा।
आज स्थिति यह हो गई है कि सरकार से सवाल पूछना, विरोध दर्ज कराना या अपनी जायज मांग रखना भी 'देशद्रोह' या सरकार के खिलाफ साजिश जैसा पेश किया जाने लगा है। विरोध की हर आवाज को कुचलने के लिए पुलिस बल और केंद्रीय एजेंसियों का बेखौफ इस्तेमाल हो रहा है। जंतर-मंतर पर इंटरनेट शटडाउन करना और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को डराना-धमकाना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि सत्ता तानाशाह रवैया अपना चुकी है।
अब चुप रहने का वक्त नहीं है!
देश के युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाली और तानाशाही की हदें पार कर रही इस सत्ता को उखाड़ फेंकने का समय अब आ चुका है। जो सरकार जनता की बात सुनने की बजाय बहरी और गूंगी हो जाए, जिसे छात्रों के आंसुओं और युवाओं के संघर्ष से कोई फर्क न पड़े, उसे देश की सत्ता में बने रहने का कोई अधिकार नहीं है।
अगर आज हम नहीं जागे, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी। तानाशाही ताकतों को यह दिखाना होगा कि देश संविधान और जनता से चलता है, किसी की तानाशाही से नहीं। अब समय आ गया है कि एकजुट होकर इस दमनकारी व्यवस्था को कड़ा संदेश दिया जाए और देश को तानाशाही की बेड़ियों से मुक्त कराया जाए।

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