Alpha Movie Review और यह फिल्म के पीछे का काला सच है

 
क्या ये धीरे-धीरे ऊपर चढ़ पाएगी या फिर अपने साथ इस यूनिवर्स को हमेशा के लिए साथ ले जाएगी। अल्फा 

की शुरुआत होती है कारगिल वॉर के बाद और फिर पहली एंट्री होती है अनिल कपूर की जिसके अगले ही सीन में बॉबी देओल का चेहरा सामने आता है जिन पे उनका हरियाणवी एक्सेंट बिल्कुल सूट नहीं करता। फिर पता चलता है क्या है यह अल्फा? एक सुपर ह्यूमन प्रोग्राम बोल सकते हो जो देश के लिए ऐसे सोल्जर्स बना

रहा है जो बाकी इंसान से 100 गुना ताकतवर हैं। इन शॉर्ट इंसान को भगवान बनने का मौका देना। अब होती है फिल्म में आलिया भट्ट की एंट्री। एकदम धांसू स्टाइल में सीधा एक्शन से शुरुआत करती हैं। जहां पे उनके चेहरे के फालतू एक्सप्रेशन उस सीन को नकली बना देते हैं। इस फिल्म में अपने कैरेक्टर को लार्जर देन लाइफ


 दिखाने के चक्कर में आलिया ने बहुत ज्यादा ही ओवर कर दिया अपने एटीट्यूड और बोलने के तरीके को। सिर्फ एक सीन अच्छा है उनका इस फिल्म में। सलमान खान अपना ब्रेसलेट घुमाते हैं तो वह एक मोमेंट बन जाता है। बादशाह अपना पोज़ बनाते हैं तो लोग चार्ज हो जाते हैं। अब आलिया के पास ऐसा कुछ भी नहीं है। इसीलिए वो सिर्फ अपने चेहरे को इतना ज्यादा कूल बनाने के प्रेशर में रोबोट की तरह डायलॉग्स बोलकर सारे मासी सीन्स पे पानी फेर देती हैं। फिर होती है फिल्म में शरबवरी की एंट्री। नदी के जैसा बहती है ये लड़की एकदम फ्रेश फ्री और रंगीन। शरबरी जब-जब स्क्रीन पे आती है एकदम रियल नेचुरल इंसानों जैसी लगती है रोबोट जैसी नहीं। यहां पे फिल्म में पहली बार होता है इन दोनों का आमनासामना। मुलाकात मुक्कालात में बदल जाती है। एक फीमेल फिल्म के स्टैंडर्ड के हिसाब से अच्छा फेस ऑफ दिखाया है। धुरंधर के लेवल का मारकाट एक्सपेक्ट मत करना। वह तो इंपॉसिबल है। यहां से स्पाई यूनिवर्स को दुर्गा और सीता मिल जाते हैं। वैसे यह बात आलिया फैंस को सबसे ज्यादा चुभेगी। लेकिन जब यह दोनों एक साथ किसी सीन में आती हैं तो शरबरी आलिया को कच्चा चबा जाती हैं। बाय द वे जो लोग फिल्म के ट्रेलर को देखकर डिसपॉइंटंटेड हो गए थे। इसमें पिछली स्पाई मूवीस जैसा ग्लैमर नहीं है तो वो सिर्फ एक धोखा है। फिल्म ट्रोल ना हो जाए इस डर से छुपा रखा था। 5 6 मिनट का अच्छा खासा बोल्ड सीक्वेंस है जिसमें शरबरी के सीन्स ने स्क्रीन को आग लगा दी थी। आलिया भट्ट को एक्टिंग और बॉडी दोनों में ओवर शैडो कर दिया। तो सरप्राइजिंगली काफी टाइम बाद एक स्पाई यूनिवर्स की फिल्म में पहला हाफ काफी ज्यादा स्टोरी पे फोकस करता है। बड़े स्मूथ तरीके से सारे कैरेक्टर्स को आपस में जोड़ देते हैं और बातों ही बातों में इंटरवल हो जाता है। लेकिन जैसे ही सेकंड हाफ की शुरुआत होती है, अल्फा अपनी कहानी को भूल जाती है। फिल्म की कहानी आगे ही नहीं बढ़ती। पुरानी स्पाई मूवीस की तरह पूरा फोकस सिर्फ एक्शन, एक्शन और जबरदस्ती की चू मेरा मतलब हीरो बनती। और तब याद आया इस फिल्म की कहानी उदय चोपड़ा ने लिखी है। बट हेलो सेकंड हाफ में बॉबी देओल के साथ एक
 ऐसा ट्विस्ट डाला है जिसे लिखते वक्त राइटर साहब को कुछ ऐसा फील हो रहा होगा बट पब्लिक को वो सीन ऐसा दिखेगा। पहले ही वर्न कर देती हूं आपको इस फिल्म का लॉजिक से कोई लेना देना नहीं है। अल्फा को सीक्रेट प्रोग्राम बता के हाथ पे बड़ा सा टैटू बनाना तो कुछ भी नहीं था। बॉबी देओल के अतरंगी बिना सर पैर के ट्विस्ट के सामने। लेकिन इस पूरी फिल्म के हाईलाइट है कैमियोस। टोटल दो लोग हैं। एक से तो आप ट्रेलर में ऑलरेडी मिल चुके हो और दूसरी एक सुंदर हसीना जिनका एंट्री हो के एग्जिट भी जल्दी हो गया। हम लोग फोकस करते हैं मेजर कबीर पे। अनडाउटेडली अल्फा का बेस्ट सीन है फिल्म में रितिक रोशन की एंट्री। जब कबीर इन नए एजेंट्स के साथ मिलके एक्शन करता है तो पुराना इमोशन याद आ जाता है। लेकिन ये कैमियो क्यों डाला? क्या कहानी में यह कहीं से भी फिट होता है या फिर आगे चलके इस्तेमाल होगा या नहीं? ये सारे सवाल आपको इग्नोर करने पड़ेंगे क्योंकि राइडर कौन है? जानते हो ना? लेकिन जो दूसरे मर्द है अनिल कपूर उनके सीन्स बहुत फालतू है इस फिल्म में। पता नहीं कहां से कौन सा बटन दबाते हैं और दिवाली के पटाखे चल जाते हैं जिसके सामने लोग अचानक से नागिन डांस करके मरने लगते हैं। इनसे जुड़ा एक फैमिली एंगल भी डाला है फिल्म में वो भी एकदम फेक लगता है। कोई इमोशन नहीं, कोई कनेक्शन नहीं। इसके सामने तो मिहिर और तुलसी का रिश्ता ज्यादा सच्चा लगता है। पता है इस फिल्म की एक वो सबसे बड़ी गलती कौन सी है जिसको अगर फिक्स कर लेते तो यह सेम फिल्म उतनी भी खराब नहीं लगती। फिल्म का क्लाइमेक्स आलिया भट्ट वर्सेस बॉबी देओल यह 1% भी काम नहीं करेगा। फिल्म की एंडिंग सुपर फ्लॉप है भाई। अगर इसी सेम सीन में आलिया के सामने दीपिका को रख दो या फिर कैटरीना से बदल दो। एक फीमेल हीरोइन के सामने एक फीमेल विलेन कैरेक्टर वो भी ऐसा जिसका रियल लाइफ से कनेक्शन है। अल्फा आग बन सकती थी। इवन शरबवरी वर्सेस आलिया हो जाता तब भी वॉर जैसा फील आता लेकिन आलिया शरबवरी से हारेंगी नहीं और आलिया जीत जाती तो पब्लिक को भरोसा नहीं होता क्योंकि शरबवरी शरबवरी नहीं सवा शेर लग रही हैं। देखो सच्ची बताऊं अल्फा को देखकर आपको अल्फा के लिए अच्छा बुरा कुछ भी फील नहीं होगा। उल्टा रियलाइज जरूर हो जाएगा कि धुरंधर जैसी फिल्म सिर्फ प्रोपगेंडा से नहीं चली बल्कि उसका फिल्म मेकिंग कितना ज्यादा ओरिजिनल और यूनिक था। थैंक यू आदित्यधर। एक ही दिल है कितनी बार जीतोगे। फिर भी अल्फा को मिलेंगे पांच में से डेढ़ स्टार। आधा शरवरी के लिए आधा रितिक की एंट्री और आधा म्यूजिक। हां जी म्यूजिक मस्त है। इंग्लिश, पंजाबी सब मिलेगा। बट आलिया को यह फिल्म बिल्कुल सूट नहीं करती। उन्होंने एक्टिंग भी बहुत ज्यादा ओवर की है। और बॉबी देओल को तो जोकर बना दिया। यह वाला नहीं यह वाला। और अगर आपको भी जोकर नहीं बनना तो बेबी डू डाई डू जैसे सिनेमा का साथ मत छोड़ना। यह अल्फा, बीटा, गामा तो आगे भी बहुत आएंगे। टेक केयर। बाय-बाय।
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