साये का सौदागर
उस रात अमरपाटन हाईवे पर सन्नाटा कुछ ज़्यादा ही गहरा था। घने कोहरे की वजह से गाड़ी की हेडलाइट की रोशनी भी कुछ मीटर आगे जाकर दम तोड़ रही थी। रात के करीब दो बज रहे थे। मैं अपनी कार से सतना की तरफ लौट रहा था। थकान के मारे मेरी आँखें भारी हो रही थीं, इसलिए मैंने गाड़ी की खिड़की का शीशा थोड़ा नीचे गिरा दिया ताकि ठंडी हवा से नींद उड़ सके। लेकिन जैसे ही शीशा नीचे हुआ, गाड़ी के भीतर अजीब सी सड़न और सीलन की बदबू भर गई। मैंने नाक सिकोड़ते हुए शीशा वापस ऊपर चढ़ा दिया।
तभी हेडलाइट की धुंधली रोशनी में मुझे सड़क के किनारे एक साया खड़ा दिखाई दिया। उस सुनसान जगह पर, इस कड़कड़ाती ठंड में कोई अकेला खड़ा था। जैसे ही मेरी गाड़ी करीब पहुँची, उस साये ने लिफ्ट माँगने के लिए हाथ उठाया। वह एक बूढ़ा आदमी था, जिसने सिर से पैर तक एक पुराना, मटमैला कंबल ओढ़ रखा था। उसका चेहरा पूरी तरह साये में छिपा था।
आमतौर पर मैं रात के वक्त किसी अजनबी को गाड़ी में नहीं बिठाता, लेकिन उस सुनसान हाईवे और कँपकँपाती ठंड को देखकर मुझे दया आ गई। मैंने गाड़ी के ब्रेक लगा दिए।
गाड़ी रुकते ही वह बूढ़ा बिना कोई आवाज़ किए पिछली सीट का दरवाज़ा खोलकर अंदर बैठ गया। उसके बैठते ही गाड़ी का तापमान अचानक से गिर गया, मानो किसी ने कार के अंदर बर्फ की सिल्ली रख दी हो। वही सीलन और सड़न की बदबू, जो मैंने बाहर महसूस की थी, अब गाड़ी के अंदर बुरी तरह फैल चुकी थी।
शीशे में मुझे सिर्फ उसका कंबल दिखाई दे रहा था, उसका चेहरा अब भी गायब था। उसने अपनी सूखी, दरदरी आवाज़ में सिर्फ एक शब्द कहा, "आगे..."
उसकी आवाज़ सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए। वह किसी इंसान की आवाज़ नहीं लग रही थी, बल्कि ऐसा लग रहा था जैसे कोई बहुत पुरानी सूखी पत्तियाँ आपस में रगड़ खा रही हों। मैंने डर को दबाते हुए गाड़ी आगे बढ़ा दी।
रास्ता कटता गया, लेकिन गाड़ी के अंदर का सन्नाटा भारी होता जा रहा था। अपनी घबराहट को कम करने के लिए मैंने रेडियो ऑन कर दिया। लेकिन रेडियो चालू करते ही उसमें से कोई गाना बजने के बजाय सिर्फ अजीब सी सरसराहट और चीखने जैसी आवाज़ें आने लगीं। मैंने तुरंत रेडियो बंद कर दिया।
तभी बैक-व्यू मिरर में मेरी नज़र फिर से पिछली सीट पर पड़ी। इस बार जो मैंने देखा, उसने मेरे पैरों तले से ज़मीन खिसका दी। वह बूढ़ा कंबल ओढ़े बैठा तो हुआ था, लेकिन उसकी पीठ मेरी तरफ थी और उसका चेहरा पीछे की खिड़की की तरफ था। मुझे लगा कि शायद वह बाहर देख रहा है, लेकिन जब मैंने ध्यान से देखा, तो उसकी रीढ़ की हड्डी अजीब तरीके से मुड़ी हुई थी। उसका धड़ तो मेरी तरफ था, लेकिन उसका सिर पूरा 180 डिग्री घूमकर पीछे की तरफ देख रहा था।
मेरा गला सूख गया। माथे पर पसीने की बूंदें छलक आईं। मैंने हिम्मत जुटाकर खिड़की के शीशे से बाहर देखा। कोहरे के बीच सड़क के किनारे एक पुराना, जर्जर साइनबोर्ड दिखाई दिया, जिस पर लिखा था—"सावधानी! आगे अंधा मोड़ है और दुर्घटना संभावित क्षेत्र है।"
"चेहरा देखना है?" उस साये ने कहा। और धीरे-धीरे, वह कंबल नीचे खिसकने लगा।
जैसे ही कंबल हटा, मेरी चीख निकल गई। वहाँ कोई चेहरा नहीं था। सिर्फ सूखी हुई काली चमड़ी हड्डियों से चिपकी हुई थी, और जहाँ आँखें होनी चाहिए थीं, वहाँ दो गहरे, अंधेरे गड्ढे थे जिनमें से गाढ़ा, काला खून बह रहा था। सबसे खौफनाक बात यह थी कि उसका जबड़ा नीचे की तरफ लटका हुआ था और वह बिना हिले-डुले हंस रहा था। उसकी हंसी की आवाज़ सीधे मेरे दिमाग के अंदर गूँज रही थी।
डर के मारे मेरा संतुलन खो गया। मैंने ज़ोर से ब्रेक पैडल दबाया, लेकिन ब्रेक फेल हो चुके थे। गाड़ी की रफ्तार खुद-ब-खुद बढ़ने लगी—80... 100... 120 किलोमीटर प्रति घंटा! स्टीयरिंग व्हील मेरे हाथ में था, लेकिन वह मेरी मर्जी से नहीं घूम रहा था। गाड़ी सीधे उस अंधे मोड़ की तरफ भाग रही थी जहाँ गहरी खाई थी scraps।
वह साया पिछली सीट से रेंगता हुआ आगे आया। उसके ठंडे, सड़ते हुए हाथ मेरे कंधों पर आ टिके। उसकी छुअन इतनी ठंडी थी कि मुझे लगा मेरा खून जम जाएगा। उसने मेरे कान के पास अपना मुंह लाया और फुसफुसाया, "मुझे एक नया जिस्म चाहिए... इस हाईवे पर भटकते-भटकते सदियाँ बीत गईं। आज रात तुम मेरे साथ चलोगे।"
तभी मुझे याद आया कि कार के डैशबोर्ड पर एक छोटा सा हनुमान चालीसा का लॉकेट रखा था। मैंने अपनी पूरी ताकत बटोरी, स्टीयरिंग से एक हाथ हटाया और उस लॉकेट को कसकर पकड़ लिया। मैंने आँखें बंद कीं और ज़ोर-ज़ोर से मंत्र पढ़ने लगा scraps।
जैसे ही मैंने भगवान का नाम लिया, गाड़ी के अंदर एक भयानक चीख गूँजी। वह आवाज़ इतनी तेज़ थी कि कार के सारे शीशे चटक गए। मेरे कंधों पर से वह भारी और ठंडा दबाव अचानक गायब हो गया।
जब मैंने आँखें खोलीं, तो गाड़ी उस अंधे मोड़ से महज़ दो फीट की दूरी पर रुक चुकी थी। हेडलाइट की रोशनी सीधे खाई के ऊपर पड़ रही थी। अगर एक सेकंड की भी देरी होती, तो गाड़ी सीधे नीचे होती।
मैंने हांफते हुए पीछे मुड़कर देखा। पिछली सीट पूरी तरह खाली थी। वहाँ कोई नहीं था, सिवाय उस मटमैले, फटे हुए पुराने कंबल के। गाड़ी के अंदर की वह सड़न वाली बदबू अब गायब हो चुकी थी और उसकी जगह सुबह की ठंडी, साफ हवा कार में भर रही थी।
मैंने बिना एक पल गंवाए गाड़ी को रिवर्स किया और वहाँ से इतनी तेज़ भगाई कि सीधे सतना जाकर ही दम लिया। आज भी जब मैं उस रात को याद करता हूँ, तो मेरी रूह काँप जाती है। अमरपाटन का वह हाईवे आज भी वहीं है, और शायद वह साया आज भी किसी अकेली गाड़ी और एक नए जिस्म के इंतज़ार में सड़क किनारे हाथ उठाए खड़ा है।