ममता बनर्जी का सियासी अवसान या कांग्रेस के साथ नई शुरुआत? पश्चिम बंगाल और राष्ट्रीय राजनीति का सबसे बड़ा विश्लेषण

विशेष रिपोर्ट | सुहैल नियान द्वारा | जून 2026

भारतीय राजनीति के इतिहास में साल 2026 को सत्ता के बड़े उलटफेरों और अभूतपूर्व संदिग्ध राजनीतिक संकटों के लिए याद किया जाएगा। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने न केवल सूबे की सियासत को पूरी तरह बदल कर रख दिया, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता के ताने-बाने को भी झकझोर दिया है। तीन दशकों से अधिक समय तक सड़क से लेकर सत्ता तक संघर्ष करने वाली और 'अग्निकन्या' के नाम से मशहूर ममता बनर्जी आज अपने जीवन के सबसे कठिन दौर से गुजर रही हैं। उनकी अपनी पार्टी, अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (TMC), आंतरिक बगावत की ऐसी आग में झुलस रही है जिसने पार्टी के वजूद पर ही सवालिया निशान लगा दिया है।

यह विश्लेषण केवल एक चुनावी हार की कहानी नहीं है, बल्कि यह कहानी है उस बगावत की जिसने संसद से लेकर कोलकाता के कालीघाट तक हड़कंप मचा रखा है। इसमें हम विस्तार से बात करेंगे कि कैसे तृणमूल कांग्रेस के 20 लोकसभा सांसदों ने ममता बनर्जी के नेतृत्व को चुनौती दी, दिल्ली के गलियारों में क्या खिचड़ी पक रही है, और इस महासंकट के बीच ममता बनर्जी और कांग्रेस आलाकमान—विशेषकर सोनिया गांधी—के बीच हुई गुप्त मुलाकातों के क्या सियासी मायने हैं।

ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी
चित्र 1: राष्ट्रीय राजनीति में अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए संघर्ष करतीं तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी।

2. तृणमूल कांग्रेस का आंतरिक महाविस्फोट: 20 सांसदों का विद्रोह

2026 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी और वाम-कांग्रेस गठबंधन के आक्रामक उभार के सामने तृणमूल कांग्रेस का किला ढह गया। इस हार की गूंज अभी शांत भी नहीं हुई थी कि दिल्ली की संसद में टीएमसी को दूसरा और सबसे घातक झटका लगा। लोकसभा में पार्टी के कुल 29 सांसदों में से 20 सांसदों ने ममता बनर्जी और उनके भतीजे व घोषित उत्तराधिकारी अभिषेक बनर्जी के खिलाफ खुला विद्रोह कर दिया।

इस विद्रोह की पटकथा पिछले कई महीनों से लिखी जा रही थी, लेकिन चुनावी नतीजों ने इसे धरातल पर लाने का काम किया। बागी सांसदों का नेतृत्व पार्टी की वरिष्ठ नेता और पूर्व चीफ व्हिप डॉ. काकोली घोष दस्तदार कर रही हैं। इन सांसदों का आरोप है कि पार्टी के भीतर सांगठनिक स्तर पर लोकतंत्र पूरी तरह खत्म हो चुका है और फैसले केवल एक बंद कमरे में लिए जा रहे हैं।

दिल्ली में गोपनीय बैठक और नया गुट

विद्रोह के पहले चरण में इन 20 सांसदों ने नई दिल्ली में केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के आधिकारिक आवास पर एक लंबी और गोपनीय बैठक की। इस बैठक के बाद जो हुआ, उसने विपक्ष के पैरों तले जमीन खिसका दी। बागी गुट ने लोकसभा अध्यक्ष को एक आधिकारिक ज्ञापन सौंपकर संसद के भीतर खुद को एक 'अलग और स्वतंत्र गुट' के रूप में मान्यता देने की मांग की है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दलबदल कानून से बचने के लिए दो-तिहाई बहुमत (29 में से 20 सांसद) का यह आंकड़ा बेहद सोच-समझकर जुटाया गया है। यह गुट अब केंद्र की बीजेपी-नीत एनडीए (NDA) सरकार को बाहर से समर्थन देने की घोषणा कर चुका है, जिससे केंद्र सरकार और अधिक मजबूत स्थिति में आ गई है।

"यह तृणमूल कांग्रेस के इतिहास का सबसे काला दिन है। जिन सांसदों को ममता बनर्जी के नाम पर बंगाल की जनता ने चुनकर भेजा था, उन्होंने निजी स्वार्थ और केंद्रीय एजेंसियों के डर से पार्टी की पीठ में छुरा घोंपा है।"
— कल्याण बनर्जी, वरिष्ठ टीएमसी सांसद (वफादार गुट)
ममता बनर्जी और सोनिया गांधी
चित्र 2: सोनिया गांधी के आवास 10, जनपथ पर ममता बनर्जी की रणनीतिक बैठक।

3. दिल्ली की आपात दौड़: 10, जनपथ पर ममता बनर्जी की सोनिया गांधी से गुहार

कोलकाता से लेकर दिल्ली तक अपनी राजनीतिक जमीन खिसकती देख ममता बनर्जी ने बिना वक्त गंवाए दिल्ली का रुख किया। राष्ट्रीय राजधानी पहुंचते ही उन्होंने सबसे पहले विपक्षी दलों के 'INDIA' गठबंधन की आपातकालीन बैठक में हिस्सा लिया। हालांकि, इस बैठक का मुख्य आकर्षण वह मुलाकात रही जो बैठक के तुरंत बाद 10, जनपथ यानी कांग्रेस संसदीय दल की प्रमुख सोनिया गांधी के आवास पर हुई।

सूत्रों के मुताबिक, ममता बनर्जी और सोनिया गांधी के बीच लगभग डेढ़ घंटे तक बंद कमरे में बातचीत हुई। इस मुलाकात के दौरान ममता बनर्जी बेहद भावुक नजर आईं और उन्होंने सोनिया गांधी से पुरानी दोस्ती का हवाला देते हुए इस कठिन समय में राजनीतिक और नैतिक समर्थन मांगा। ममता का मुख्य उद्देश्य कांग्रेस के जरिए संसद में उनके बागी गुट को अलग मान्यता मिलने की प्रक्रिया को कानूनी और राजनीतिक रूप से चुनौती देना है।

क्या कोई नया समझौता आकार ले रहा है?

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि क्या ममता बनर्जी अपनी क्षेत्रीय पार्टी का वजूद बचाने के लिए कांग्रेस के साथ किसी बड़े समझौते या विलय की दिशा में बढ़ रही हैं? चूंकि ममता बनर्जी ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत कांग्रेस से ही की थी (1998 में उन्होंने टीएमसी बनाई थी), इसलिए उनके लिए कांग्रेस की छतरी के नीचे आना कोई असंभव कदम नहीं है। सोनिया गांधी ने ममता की बातों को ध्यान से सुना है, लेकिन उन्होंने कोई भी अंतिम फैसला लेने से पहले राहुल गांधी और पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं से चर्चा करने की बात कही है।

राजनीतिक मुख्यालय दिल्ली
चित्र 3: नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का मुख्यालय, जहाँ बंगाल नीति पर मंथन जारी है।

4. कांग्रेस का आंतरिक अंतर्विरोध: केंद्रीय नेतृत्व बनाम प्रांतीय इकाई

ममता बनर्जी भले ही सोनिया गांधी से मिलकर मदद की उम्मीद कर रही हों, लेकिन कांग्रेस के लिए यह फैसला इतना आसान नहीं है। पार्टी इस समय एक बड़े आंतरिक अंतर्विरोध से जूझ रही है। एक तरफ जहाँ सोनिया गांधी और राहुल गांधी राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के खिलाफ एक मजबूत और एकजुट विपक्ष चाहते हैं, जिसमें ममता बनर्जी की उपस्थिति महत्वपूर्ण है, वहीं दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल की स्थानीय कांग्रेस इकाई ममता बनर्जी को किसी भी तरह की राहत देने के सख्त खिलाफ है।

पश्चिम बंगाल कांग्रेस के नेताओं का साफ कहना है कि पिछले 15 सालों में ममता बनर्जी ने बंगाल में कांग्रेस को व्यवस्थित रूप से कमजोर और खत्म करने का काम किया है। पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ताओं का तर्क है कि जब टीएमसी खुद अपने कर्मों और आंतरिक कलह से बिखर रही है, तो कांग्रेस को उसे 'लाइफ सपोर्ट' देने की कोई जरूरत नहीं है। बंगाल के स्थानीय नेताओं ने आलाकमान को चेतावनी दी है कि अगर ममता बनर्जी के साथ कोई भी समझौता किया गया, तो बंगाल का बचा-खुचा कांग्रेस कार्यकर्ता भी पार्टी से नाता तोड़ लेगा।

प्रेस वार्ता
चित्र 4: संकट के बीच मीडिया के तीखे सवालों का सामना करतीं ममता बनर्जी।

5. भविष्य का परिदृश्य: शत्रुघ्न, देव और वफादारों की अग्निपरीक्षा

इस अभूतपूर्व संकट के बीच, तृणमूल कांग्रेस के भीतर कुछ ही ऐसे चेहरे बचे हैं जो पूरी मजबूती और वफादारी के साथ 'दीदी' के पीछे खड़े हैं। इनमें आसनसोल से सांसद और बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा और घाटाल से सांसद व बांग्ला सिनेमा के सुपरस्टार देव (दीपक अधिकारी) शामिल हैं। इन दोनों नेताओं ने स्पष्ट किया है कि वे वैचारिक रूप से ममता बनर्जी के साथ जुड़े हैं और किसी भी लालच या दबाव में आकर पाला नहीं बदलेंगे। उनके अलावा कीर्ति आजाद और कल्याण बनर्जी लगातार बागी सांसदों के खिलाफ कानूनी मोर्चे पर डटे हुए हैं।

आगे की राह और निष्कर्ष

पश्चिम बंगाल की सीआईडी (CID) द्वारा विधायकों और सांसदों के हस्ताक्षरों की जांच और बीजेपी द्वारा ममता बनर्जी के इस्तीफे की लगातार की जा रही मांग ने राज्य में प्रशासनिक गतिरोध पैदा कर दिया है। आने वाले कुछ दिन यह तय करेंगे कि क्या ममता बनर्जी अपनी अद्भुत जुझारू क्षमता के बल पर इस राजनीतिक चक्रव्यूह को भेद पाएंगी या फिर 'जन बारात न्यूज़' के इस विशेष विश्लेषण के मुताबिक, बंगाल की राजनीति में तृणमूल युग का अवसान होकर एक नया त्रिकोणीय या द्विध्रुवीय राजनीतिक समीकरण (बीजेपी बनाम कांग्रेस-वाम) स्थापित होगा।

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