मिडल ईस्ट में महायुद्ध का शंखनाद: ईरान और इज़राइल के बीच सीधे टकराव से कांपा विश्व, दागी गईं सैकड़ों बैलिस्टिक मिसाइलें — संपूर्ण विश्लेषण
यरूशलेम/तेहरान: पश्चिम एशिया (Middle East) इस वक्त इतिहास के सबसे खतरनाक मोड़ पर खड़ा है। दशकों से चल रहा छद्म युद्ध (Proxy War) अब एक पूर्ण और सीधे सैन्य टकराव में बदल चुका है। ईरान और इज़राइल ने एक-दूसरे की संप्रभुता को चुनौती देते हुए सीधे तौर पर सैन्य ठिकानों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। दोनों देशों की ओर से दागी जा रही मिसाइलों और हवाई हमलों ने पूरी दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध (Third World War) के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसमें वैश्विक महाशक्तियां भी सीधे तौर पर कूद सकती हैं।
1. हमले की शुरुआत और ईरान का 'ऑपरेशन'
आधिकारिक सूत्रों और रक्षा मंत्रालयों से मिली जानकारी के अनुसार, ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने आधी रात को इज़राइल के प्रमुख हवाई अड्डों, रडार स्टेशनों और खुफिया मुख्यालयों को निशाना बनाते हुए 200 से अधिक हाइपरसोनिक और बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। तेहरान का दावा है कि यह हमला इज़राइली सेना द्वारा उनके कमांडरों और राजनयिक ठिकानों पर किए गए हमलों का सीधा और आनुपातिक जवाब है। ईरान के सर्वोच्च नेता ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि इज़राइल ने दोबारा कोई हिमाकत की, तो उसे नेस्तनाबूद कर दिया जाएगा। हमलों के बाद ईरान के प्रमुख शहरों में जश्न का माहौल देखा गया, वहीं दूसरी ओर रक्षा मंत्रालय ने अपने सभी मिसाइल सिलोस को हाई अलर्ट पर डाल दिया है।
2. इज़राइल का 'आयरन डोम' और जवाबी कार्रवाई की कसम
ईरान के इस बड़े हमले के बाद इज़राइल के तेल अवीव, यरूशलेम और हाइफ़ा जैसे प्रमुख शहरों में हवाई हमलों के सायरन गूंज उठे। लाखों नागरिकों को तुरंत बंकरों में शरण लेनी पड़ी। इज़राइल के एडवांस्ड एयर डिफेंस सिस्टम 'आयरन डोम' (Iron Dome), 'डेविड्स स्लिंग' (David's Sling) और 'एरो-3' (Arrow-3) ने हवा में ही अधिकांश मिसाइलों को इंटरसेप्ट करके नष्ट कर दिया, लेकिन कुछ मिसाइलें सैन्य ठिकानों पर गिरने में कामयाब रहीं, जिससे भारी नुकसान की आशंका जताई जा रही है। इज़राइली प्रधानमंत्री ने युद्ध कैबिनेट की आपातकालीन बैठक के बाद देश को संबोधित करते हुए कहा, "ईरान ने आज रात एक बहुत बड़ी गलती की है, और उसे इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। हमारी जवाबी कार्रवाई ऐसी होगी जिसे मिडल ईस्ट सदियों तक याद रखेगा।"
3. वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंडराया काला साया
इस युद्ध की चिंगारी भड़कते ही वैश्विक बाजारों में हाहाकार मच गया है। कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में अचानक 8 से 10 प्रतिशत तक बढ़ गई हैं। यदि होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के रास्ते तेल की आपूर्ति बाधित होती है, तो दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल के दाम आसमान छूने लगेंगे, जिससे भारत सहित कई विकासशील देशों में महंगाई का एक नया दौर शुरू हो सकता है। इसके अलावा, एशिया और यूरोप को जोड़ने वाले हवाई मार्ग पूरी तरह से बंद कर दिए गए हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के किरायों में भारी वृद्धि दर्ज की गई है। शेयर बाजारों में चौतरफा गिरावट का दौर शुरू हो गया है और निवेशक सोने (Gold) जैसे सुरक्षित ठिकानों में अपना पैसा लगा रहे हैं।
4. महाशक्तियों का रुख: कौन किसके साथ?
इस महायुद्ध ने दुनिया को दो धड़ों में बांट दिया है। संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) ने पूरी तरह से इज़राइल का समर्थन करने की घोषणा की है और भूमध्य सागर में अपने परमाणु विमानवाहक पोतों को तैनात कर दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा है कि वे इज़राइल की रक्षा के लिए हर संभव कदम उठाएंगे। दूसरी ओर, रूस और चीन ने इस स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की है और दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की है, हालांकि रणनीतिक रूप से उनका झुकाव ईरान की तरफ देखा जा रहा है। यूरोपीय संघ ने ईरान के हमलों की कड़ी निंदा की है, जबकि मध्य पूर्व के अन्य मुस्लिम देश जैसे सऊदी अरब और यूएई इस समय स्थिति पर पैनी नजर बनाए हुए हैं और अपने हवाई क्षेत्र को सुरक्षित करने में जुटे हैं।
5. भविष्य की राह और भारत पर इसका असर
भारत के लिए यह संकट दोहरी चुनौती लेकर आया है। मध्य पूर्व में करीब 90 लाख भारतीय प्रवासी रहते हैं, जिनकी सुरक्षा को लेकर भारत सरकार बेहद संवेदनशील है। विदेश मंत्रालय ने पहले ही एक ट्रैवल एडवाइजरी जारी कर भारतीयों को इन क्षेत्रों की यात्रा न करने की सलाह दी है। रणनीतिक स्तर पर, भारत के संबंध इज़राइल और ईरान दोनों के साथ बेहद मजबूत और संतुलित रहे हैं। भारत जहां चाबहार बंदरगाह के जरिए यूरेशिया तक पहुंच के लिए ईरान पर निर्भर है, वहीं रक्षा तकनीकों और रणनीतिक साझेदारी के लिए इज़राइल भारत का एक बेहद विश्वसनीय साथी है। ऐसे में भारत इस युद्ध को रोकने के लिए कूटनीतिक रास्तों का इस्तेमाल कर सकता है और दोनों देशों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश कर सकता है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अगली बैठक पर अब पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं कि क्या इस महाविनाश को रोका जा सकेगा या दुनिया एक बड़े विनाशकारी युद्ध की गवाह बनेगी।