भूलकर भी पीछे मुड़कर मत देखना! उस सुनसान हाईवे और लाल डायरी का खौफनाक सच
रात के ठीक दो बज रहे थे। चारों तरफ ऐसा सन्नाटा था मानो हवा भी अपनी सांसें रोककर किसी अनहोनी का इंतजार कर रही हो। हाईवे नंबर 44 पर दूर-दूर तक कोई गाड़ी दिखाई नहीं दे रही थी। सिर्फ एक पुरानी काली एसयूवी कार उस घने अंधेरे को चीरती हुई आगे बढ़ रही थी। गाड़ी की हेडलाइट्स की पीली रोशनी जहाँ तक जाती, वहाँ सिर्फ सड़क के दोनों तरफ खड़े ऊंचे, सूखे पेड़ दिखाई देते, जो अंधेरे में किसी दैत्य की तरह लग रहे थे। गाड़ी के भीतर सन्नाटा पसरा हुआ था, जिसे केवल इंजन की हल्की गड़गड़ाहट तोड़ रही थी।
गाड़ी चला रहे समीर की आँखें थकान से लाल हो चुकी थीं। वह पिछले छह घंटों से बिना रुके गाड़ी चला रहा था। उसका मोबाइल नेटवर्क पूरी तरह गायब हो चुका था और जीपीएस स्क्रीन पर केवल एक ही संदेश आ रहा था - नो सिग्नल। समीर ने चिढ़कर मोबाइल को बगल की सीट पर फेंक दिया। उसे अपने दोस्त की बात मान लेनी चाहिए थी, जिसने कहा था कि रात के समय इस पुराने हाईवे से मत जाना। लेकिन समीर ठहरा लॉजिक और साइंस पर भरोसा करने वाला इंसान। वह इन सब बातों को अंधविश्वास मानता था। उसे क्या पता था कि आज की रात उसकी जिंदगी की सबसे लंबी और शायद आखिरी रात होने वाली थी।
अध्याय 1: वो अजीब मुसाफिर और सन्नाटा
जैसे ही गाड़ी एक तीखे मोड़ पर मुड़ी, हेडलाइट्स की रोशनी सड़क के किनारे खड़ी एक आकृति पर पड़ी। कोई वहाँ खड़ा था। इतनी कड़कड़ाती ठंड में, उस सुनसान हाईवे पर, जहाँ कई किलोमीटर तक कोई इंसानी बस्ती नहीं थी, किसी का खड़ा होना ही अपने आप में एक खौफनाक अहसास था। समीर ने घबराहट में ब्रेक पैडल दबाया। गाड़ी चरमराहट के साथ रुकी। रोशनी में साफ देखा जा सकता था कि वह एक बूढ़ा आदमी था, जिसने फटे-पुराने कपड़े पहने हुए थे और उसके हाथ में एक अजीब सी लाल रंग की डायरी थी।
समीर ने कार का शीशा थोड़ा नीचे किया और पूछा, "बाबा, इतनी रात को यहाँ क्या कर रहे हो? कहाँ जाना है आपको?" बूढ़े ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने धीरे से अपना सिर उठाया। उसकी आँखें... वे सामान्य नहीं थीं। उनमें कोई चमक नहीं थी, बस एक गहरा, डरावना खालीपन था। उसने अपनी सूखी उंगली से आगे की तरफ इशारा किया और अपनी कांपती हुई आवाज़ में बोला, "आगे मत जाओ बेटा, वो रास्ता मौत की तरफ जाता है। जो गया, वो कभी लौटकर नहीं आया।"
समीर को लगा कि शायद कोई पागल बूढ़ा है जो भटक गया है। उसने कहा, "बाबा, बैठिए, मैं आपको आगे शहर में छोड़ देता हूँ।" लेकिन जैसे ही समीर ने कार का दरवाज़ा खोलने के लिए हाथ बढ़ाया, वह बूढ़ा अचानक गायब हो गया। हाँ, पलक झपकते ही, मानो वह हवा में विलीन हो गया हो। समीर के माथे पर पसीने की बूंदें चमकने लगीं। उसका दिल इतनी जोर से धड़क रहा था मानो सीने से बाहर आ जाएगा। उसने बिना सोचे-समझे एक्सीलेटर पर पैर दबाया और कार को पूरी रफ्तार से आगे बढ़ा दिया।
अध्याय 2: बंद पड़ा पुराना बंगला और परछाई
कार करीब दस किलोमीटर आगे बढ़ी होगी कि अचानक उसका इंजन अजीब सी आवाज़ें करने लगा। बोनट से सफेद धुआं निकलने लगा और कार वहीं रुक गई। समीर ने बार-बार चाबी घुमाई, लेकिन इंजन चालू नहीं हुआ। मजबूरी में वह कार से नीचे उतरा। बाहर की हवा बर्फ की तरह ठंडी थी और उसमें एक अजीब सी सड़न की बदबू आ रही थी, जैसे कोई पुरानी चीज़ सड़ रही हो। उसने टॉर्च जलाई और आसपास देखा। सड़क के ठीक दाहिनी तरफ एक पुराना, जर्जर बंगला खड़ा था, जिसके लोहे के विशाल गेट पर जंग लगी हुई थी।
बंगले की दीवारें काली पड़ चुकी थीं और खिड़कियों के कांच टूटे हुए थे। समीर के पास कोई और रास्ता नहीं था। उसे सुबह होने तक कहीं पनाह चाहिए थी। वह भारी कदमों से उस बंगले की तरफ बढ़ने लगा। जैसे ही उसने गेट को धक्का दिया, एक तीखी चरमराहट की आवाज़ गूंज उठी। बंगले के आंगन में सूखी पत्तियां बिखरी हुई थीं, जिन पर चलने से खड़खड़ाहट हो रही थी। समीर मुख्य दरवाजे पर पहुँचा, जो पहले से ही आधा खुला हुआ था। अंदर कदम रखते ही उसे महसूस हुआ कि कोई उस पर नजर रख रहा है।
उसने हॉल में टॉर्च की रोशनी घुमाई। हर तरफ धूल जमी हुई थी और मकड़ी के जाले लटके थे। हॉल के बीचों-बीच एक पुरानी धूल से सनी मेज थी। समीर की नजर उस मेज पर पड़ी और उसके पैर वहीं जम गए। उस मेज पर वही लाल डायरी रखी हुई थी, जो उसने उस बूढ़े के हाथ में देखी थी। समीर का दिमाग सुन्न हो गया। वह डायरी यहाँ कैसे आ सकती थी? कौतूहल और डर के बीच झूलते हुए, उसने कदम आगे बढ़ाए और डायरी को उठा लिया।
अध्याय 3: लाल डायरी का खूनी पन्ना
समीर ने कांपते हाथों से डायरी का पहला पन्ना पलटा। उस पर धूल जमी थी, जिसे साफ करने पर खून जैसी लाल स्याही से लिखे कुछ शब्द दिखाई दिए। लिखा था - "28 जून। आज इस बंगले में आने वाला मैं आखिरी इंसान हूँ। वे दीवारों के पीछे रहते हैं। वे रात के अंधेरे में आते हैं और जब तक आप समझ पाते हैं, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। अगर आप इसे पढ़ रहे हैं, तो तुरंत भागिए, क्योंकि वे आपके पीछे भी आ चुके हैं।"
तभी अचानक समीर के ठीक पीछे से एक ठंडी सांस की आवाज़ आई। किसी के फुसफुसाने की आवाज़ - "भागो..." समीर ने डरते हुए पीछे मुड़कर देखा। टॉर्च की रोशनी में उसे एक परछाई दिखाई दी, जो इंसानी तो बिल्कुल नहीं थी। उसके हाथ-पैर अजीब तरीके से मुड़े हुए थे और वह छत से लटकी हुई समीर की तरफ रेंग रही थी। समीर के गले से चीख भी नहीं निकल पाई। उसने डायरी फेंकी और दरवाजे की तरफ भागा। लेकिन दरवाजा अपने आप पूरी ताकत से बंद हो गया और उस पर एक बड़ा सा ताला लटक गया।
वह बंद दरवाजे को पीटने लगा, "कोई है? बचाओ! दरवाजा खोलो!" लेकिन उसकी आवाज़ उस खाली बंगले में गूंजकर रह गई। ऊपर की मंजिल से भारी कदमों की आवाज़ आने लगी, जैसे कोई भारी चीज़ घसीटते हुए सीढ़ियों से नीचे आ रहा हो। धप... धप... धप... हर कदम के साथ समीर की धड़कनें रुक रही थीं। उसने टॉर्च की रोशनी सीढ़ियों की तरफ की। सीढ़ियों से एक औरत नीचे उतर रही थी, जिसके बाल आगे लटके हुए थे और उसका चेहरा पूरी तरह से झुलसा हुआ था। उसकी सफेद आँखें सीधे समीर को घूर रही थीं।
अध्याय 4: रूह कंपा देने वाला वो मंजर
वह आकृति धीरे-धीरे समीर की तरफ बढ़ रही थी। समीर ने पीछे हटते हुए हॉल के एक कोने में बने छोटे से कमरे का दरवाजा देखा। उसने बिना सोचे-समझे उस कमरे में छलांग लगाई और अंदर से कुंडी बंद कर ली। वह कमरे के कोने में बैठकर अपनी सांसें रोकने की कोशिश करने लगा। कमरे के बाहर उस भयानक रूह के हंसने की आवाज़ गूंज रही थी। एक ऐसी हंसी जो किसी के भी होश उड़ाने के लिए काफी थी। वह दरवाजे को अपने नाखूनों से खुरच रही थी। खुरचने की वह आवाज़ समीर के कानों के पर्दे फाड़ रही थी।
समीर ने अपनी आँखें बंद कर लीं और भगवान को याद करने लगा। उसे अपनी जिंदगी की सारी गलतियाँ याद आने लगीं। उसे समझ आ गया था कि विज्ञान हर जगह काम नहीं आता, कुछ ताकतें ऐसी भी होती हैं जो हमारी समझ से परे होती हैं। तभी कमरे की एकमात्र खिड़की अचानक खड़खड़ाने लगी। बाहर से वही बूढ़ा आदमी खिड़की के कांच पर अपना चेहरा चिपकाए खड़ा था। उसने खिड़की पर अपने खून से सने हाथ से लिखा - "पीछे देखो।"
समीर का पूरा शरीर बर्फ की तरह ठंडा पड़ गया। उसने बहुत धीरे से अपने पीछे मुड़कर देखा। उस छोटे से कमरे के कोने में, अंधेरे के बीच एक और आकृति बैठी हुई थी। वह आकृति हूबहू समीर जैसी ही दिख रही थी। हाँ, वह समीर खुद था, जो लहूलुहान हालत में वहाँ पड़ा हुआ था। समीर चिल्लाया, लेकिन उसकी आवाज़ नहीं निकली। उसे समझ आ गया कि वह बहुत पहले ही मर चुका है। जब उसकी कार का एक्सीडेंट हुआ था, वह तभी मर चुका था, और यह सब उसकी आत्मा के साथ हो रहा था जो इस भुतहा हाईवे पर हमेशा के लिए भटकने के लिए अभिशप्त हो चुकी थी।
निष्कर्ष: हाईवे का अंतहीन चक्र
सुबह की पहली किरण जब हाईवे नंबर 44 पर पड़ी, तो सब कुछ सामान्य था। चिड़ियाँ चहचहा रही थीं और धुंध धीरे-धीरे साफ हो रही थी। सड़क के किनारे एक पुरानी काली एसयूवी कार खड़ी थी, जो पूरी तरह से एक पेड़ से टकराकर चकनाचूर हो चुकी थी। कार के अंदर एक नौजवान की लाश थी, जिसके हाथ में एक लाल रंग की डायरी थी। पुलिस आई, पंचनामा हुआ और लाश को ले जाया गया। लेकिन आज भी, जब रात के दो बजते हैं, तो उस सुनसान हाईवे पर एक काली कार घूमती हुई दिखाई देती है, और एक बूढ़ा आदमी हाथ में लाल डायरी लिए मुसाफिरों को चेतावनी देता है। इसलिए याद रखिएगा, अगर आप कभी उस रास्ते से गुजरें, तो चाहे कुछ भी हो जाए, भूलकर भी पीछे मुड़कर मत देखना!
